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उत्तराखंड बीजेपी में आलाकमान का भय खत्म

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नितिन नबीन को लाना होगा नेताओं को अनुशासन में
द संडे मेल
देहरादून।बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का इस महीने होने वाला उत्तराखंड का दौरा खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।नितिन नबीन का यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब बीजेपी के भीतर भारी घमासान मचा हुआ है।अनुशासित माने जाने वाली बीजेपी के नेता अनुशासन की चिन्ता ही नहीं कर रहे है।न वरिष्ठता का लिहाज कर रहे हैं और ना ही आलाकमान का कोई डर दिख रहा है।नितिन नबीन को दौरे के दौरान नेताओं को अनुशासन की सीख देनी होगी।पार्टी के सामने कई चुनौतियां हैं।अंकिता भंडारी हत्याकांड में नाम उछलने के बाद से प्रदेश प्रभारी महामंत्री दुष्यंत गौतम बीते एक साल से गायब हैं।पार्टी ने रणनीति के तहत उन्हें राज्य से दूर किया हुआ है।गौतम पर तमाम तरह के आरोप अभी भी लग रहे हैं।प्रदेश में अगले साल फरवरी में चुनाव होने हैं।गौतम खुद चुनाव में बड़ा मुद्दा बनने वाले हैं।जिससे बीजेपी की परेशानी बढ़ेगी।बीजेपी में खींचतान की हालत इतनी चिंताजनक हो गई है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता भगत सिंह कोशियारी भी पार्टी बन गए हैं।अपने राजनीतिक शिष्य मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बचाव में आए दिन बयानबाजी कर विवाद पैदा कर रहे है।उनका गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी को लेकर दिए बयान से दिल्ली आलाकमान भी खुश नहीं है।क्योंकि चुनाव में अगर क्षेत्रवाद मुद्दा बना तो बीजेपी की राह बड़ी मुश्किल हो जाएगी।उत्तराखंड में बीजेपी कई गुटों में बंट चुकी है। सीएम पुष्कर सिंह धामी के एक तरफा फैसलों ने गुटबाजी को हवा दी।कहीं ना कहीं आमजन चर्चा है कि सरकार ने गढ़वाल के साथ भेदभाव किया।सरकार के कई ऐसे फैसले हैं जो दर्शाते हैं जिनमें गढ़वाल की उपेक्षा साफ झलकती है।उत्तराखंड में ये पहले से होता भी आया है।कांग्रेस के नेता  नारायण दत्त तिवारी पर भी भेदभाव के आरोप लगते थे।
   इस बार जिस तरह का भेदभाव किया गया वह चिंता बढ़ाने वाला है। भेदभाव की राजनीति बीजेपी के अंदर भी देखने को मिली।इसकी कई वजह है।धामी पार्टी को साथ लेकर  चल नहीं पाए।जब उनकी सरकार को लेकर सवाल उठने लगे तो क्षेत्रवाद की राजनीति को हवा मिली।पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जाने लगी। भ्रष्टाचार,अवैध खनन को लेकर आवाज उठने लगी।इसी बीच पेपर लीक,युवा आंदोलन और अचानक अंकिता भंडारी हत्याकांड के तूल पकड़ने से पार्टी और सरकार की छीछालेदार होने लगी।राज्य में तमाम मुद्दों को लेकर आंदोलन शुरू होने लगे।पुलिस और कानून व्यवस्था पर सवाल उठने लगे।आलाकमान ने इस सब मामलों को दर किनार कर फिलहाल धामी पर कोई एक्शन नहीं लिया। इसकी भी वजह थी।क्योंकि केंद्र पार्टी संगठन और राज्यों के चुनावों के चलते उत्तराखंड पर फोकस नहीं कर पाया।लेकिन अब जब सभी चुनाव सम्पन्न हो गए हैं आलाकमान की नजर अब उत्तराखंड पर है।नितिन नबीन के दौरे से पहले राज्य में बड़ा बदलाव होता है या उनके दौरे के बाद इस पर सबकी नजर रहेगी।दिल्ली में जैसे चर्चा है कि बीजेपी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी कभी भी घोषित हो सकती है।गौतम की जगह राज्य की जिम्मेदारी जिस भी नेता को मिलेगी उसके सामने भी पार्टी को एक जुट रखना बड़ी चुनौती होगी।आज के दिन तो हालात ऐसे हो गए हैं कि हर जिले में कई गुट दिखने लगे है।सबसे अनुशासित माने जाने वाली पार्टी के नेता कार्यकर्ता अनुशासन का ध्यान ही नहीं रख रहे है।राज्य में माहौल बना हुआ है कि बीजेपी इस बार चुनाव नहीं जीत रही है।इसके चलते नेता आपस में ही सोशल मीडिया और दूसरे तरीके से एक दूसरे की खिलाफत में जुटे हुए है।आलाकमान का डर खत्म हो गया है।
The Sunday Mail
Author: The Sunday Mail

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