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उत्तराखंड कांग्रेस की चिंताजनक हालत

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लगातार हारने वाले ही लगे हैं जुगाड में
द संडे मेल

देहरादून।कांग्रेस आलाकमान उत्तराखंड में पार्टी को ताकत देने के लिए संगठन सृजन कार्यक्रम के तहत नए जिलाध्यक्षों की खोज में जुटा है।लगातार चुनाव हारने वाले ही अपनों को जिलाध्यक्ष बनाने की जुगाड में लगे हैं।14 माह बाद होने वाले चुनाव में भी यही हारने वाले ताल ठोकेंगे।कांग्रेस के सामने आज के हालात में प्रत्याशी मिलना बड़ी चुनौती है।कांग्रेस पार्टी पिछले दो दशकों से लगातार पराजयों के चक्र में फंसी हुई है। यदि पिछले पांच विधानसभा चुनावों की बात करें तो कुल 350 सीटों पर चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस को लगभग 120 सीटें मिलीं और 230 पर हार मिली। इसी तरह पिछले पांच लोकसभा चुनावों में कुल 25 सीटों में से 18 पर पराजय झेलनी पड़ी। लगातार तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी है।2017 में पार्टी को मात्र 11 सीटें मिलीं, और 2022 में यह संख्या बढ़कर 19 हुई — दोनों को जोड़ दें तो भी बहुमत से छह सीटें कम हैं। इसके उलट, भाजपा ने 2017 में 57 और 2022 में 47 सीटें जीतकर कुल 104 सीटें हासिल कीं — जो लगातार तीन चुनावों तक बहुमत के लगभग बराबर है। साफ है कि भाजपा कांग्रेस से एक चुनाव आगे चल रही है।लेकिन सवाल यह है कि इतनी बार की हार के बावजूद उत्तराखंड कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय कांग्रेस में ‘बड़े नेता’ क्यों माने जाते हैं?
चकराता सीट से लगातार चुनाव जीतने वाले प्रीतम सिंह को लें। यह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है, जिसे पहले उनके पिता गुलाब सिंह ने उत्तर प्रदेश के दौर में संभाला था। किंतु इस पारिवारिक सीट के आसपास की चार सीटों — विकासनगर, सहसपुर, पुरोला और धनौल्टी — पर कांग्रेस लगातार हार रही है। विकासनगर दो बार से भाजपा के पास है, सहसपुर और धनौल्टी में कांग्रेस केवल एक बार जीत पाई है। इसके बावजूद प्रीतम सिंह न केवल उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं, बल्कि केन्द्रीय चुनाव समिति के सदस्य और भविष्य के मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में गिने जाते हैं।पौड़ी संसदीय क्षेत्र में इस बार भाजपा ने 14 में से 13 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज कर अपने राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत किया है। यमकेश्वर सीट पर कांग्रेस ने कई प्रयोग किए, पर हर बार हार ही हाथ लगी। चौबट्टाखाल में 2012 और 2017 में बाहरी उम्मीदवारों को टिकट मिला, जो क्रमशः 2,000 और 7,500 मतों से हार गए, तो तीसरी बार, 2022 में शराब व्यापारी केशर सिंह नेगी को टिकट दिया गया, और वे भी 12,000 वोटों से पराजित हुए। यह स्पष्ट संकेत है कि चौबट्टाखाल क्षेत्र में सतपाल महाराज और भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल गणेश गोदियाल वाक्पटु और ऊर्जावान नेता माने जाते हैं, लेकिन चुनावी प्रदर्शन उनके पक्ष में नहीं रहा। उन्होंने अब तक छह चुनाव (पांच विधानसभा और एक लोकसभा) लड़े हैं, जिनमें चार में पराजय मिली। श्रीनगर (पूर्व थैलीसेण) सीट से पार्टी ने उन पर बार-बार भरोसा जताया, पर वे 2007, 2017 और 2022 में हार गए। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर टिकट मिला और वे 1.36 लाख वोटों से हार गए।इसी तरह कोटद्वार से सुरेंद्र सिंह नेगी भी पांच में से तीन बार हार चुके हैं। पौड़ी क्षेत्र में कांग्रेस की पराजय अब केवल रणनीतिक भूल नहीं, बल्कि एक स्थायी राजनीतिक प्रवृत्ति बन चुकी है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का राजनीतिक जीवन भी लगातार हार और प्रयोगों का मिश्रण रहा है। उन्होंने स्वयं, उनकी पत्नी, बेटा और बेटी — कुल मिलाकर 16 चुनाव लड़े हैं, जिनमें केवल पांच में जीत दर्ज हुई है। वे 1989 के चुनाव के 20 साल बाद 2009 में हरिद्वार से सांसद बने, लेकिन उसके बाद फिर से पराजय की श्रृंखला लौट आई — 2017 में मुख्यमंत्री रहते दो सीटों से हारे, 2019 में लोकसभा चुनाव हारे और 2022 में भी विधानसभा नहीं जीत पाए। केवल उनकी बेटी अनुपमा रावत 2022 में जीतीं, पर 2024 में उनका बेटा वीरेंद्र रावत हरिद्वार से हार गया। फिर भी, रावत 2027 में मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा पाले हुए हैं।
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य छह बार कांग्रेस और एक बार भाजपा से विधायक रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री बनने के बावजूद वे हमेशा आरक्षित सीटों को ही सुरक्षित मानते हैं। उनके भीतर इतनी राजनीतिक हिम्मत नहीं दिखी कि वे भाजपा मंत्री रेखा आर्य के खिलाफ, सोमेश्वर की आरक्षित सीट से चुनाव लड़ें, पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा भी यह हिम्मत नहीं दिखा पा रहे हैं जबकि यह सीट उनकी लोकसभा क्षेत्र में आती है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा राजनीतिक परिवार से हैं। उन्हें भी चार चुनावों में केवल दो बार जीत मिली है — वह भी पारिवारिक सीट पर।
हरक सिंह रावत की स्थिति तो “आधे कांग्रेस और आधे भाजपा” जैसी है। उनकी बहू और सहयोगी भाजपा में हैं, जबकि वे स्वयं कांग्रेस में रहकर आरोपों और अनुशासन के बीच झूल रहे हैं, 2022 में कांग्रेस ने उनकी बहु को लेंसडाउन से टिकट दिया था जहाँ वो बुरी तरह हारकर बीजेपी में वापिस चली गई.
ऐसे नेताओं के बीच कांग्रेस के पास 2027 के लिए तकरीबन 50 सीटों पर उम्मीदवार ही नहीं हैं, जो खुद को दावेदार समझ रहे हैं, वो तीन चार बार चुनाव हारे लोग हैं। उत्तरकाशी की तीनों सीटों पर कोई दावेदार नहीं है; टिहरी में पुराने विधायक भाजपा में जा चुके हैं। देहरादून जिले की दस सीटों में कांग्रेस केवल एक जनजातीय सीट पर जीत दर्ज कर पाई है, बाकी पर बार-बार हार का सामना किया है, एक भी सीट पर दावेदार नहीं है।
पौड़ी संसदीय क्षेत्र की स्थिति तो और भी खराब है — यहाँ की 14 में से 13 सीटों पर भाजपा का कब्जा है। श्रीनगर सीट से गणेश गोदियाल को लगातार पांच बार टिकट मिला, लेकिन वे पिछले दो चुनाव हार चुके हैं।
कुमाऊं क्षेत्र में स्थिति इससे अलग नहीं है। पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा को 2014 में हार के बाद राज्यसभा भेजा गया, फिर भी उन्हें 2019 और 2024 में फिर लोकसभा का टिकट दिया गया — और दोनों बार हार मिली। कांग्रेस ने दो बार विधान सभा का चुनाव हार चुके प्रकाश जोशी को नैनीताल से प्रत्याशी बनाया, नैनीताल संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाली 14 विधान सभा सीटों पर कांग्रेस के विधायक होने के वावजूद, प्रकाश जोशी लगभग 3.36 लाख वोट के भारी अंतर से हारे।
स्पष्ट है कि उत्तराखंड कांग्रेस आज नेतृत्वहीनता के दौर में है। जिन नेताओं को जनता ने बार-बार नकारा है, वही पार्टी पर हावी हैं और नए चेहरों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ रहे। कांग्रेस पार्टी पिछले चार साल से प्रदेश कांग्रेस कमेटी नहीं बना पाई है. नतीजा यह है कि      पार्टी जनता से दूर, आत्ममुग्धता में उलझी हुई प्रतीत होती है — और जनता, उसे इतिहास की कथा मानकर आगे बढ़ चुकी है।
The Sunday Mail
Author: The Sunday Mail

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