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छवि चमकाने में लगी धामी सरकार को पलायन के दर्द का अहसास नहीं

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आवाज उठाने वाले पत्रकारों में भय पैदा करने की कोशिश
द संडे मेल
देहरादून। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के गांव लवेगढ़ से पिछले दिनों एक बड़ी मार्मिक खबर सामने आई।खबर इस प्रकार थी कि गांव में रहने वाली अकेली वृद्धा की मौत हो गई,लेकिन उसे कंधा देने वाले चार लोग गांव में नहीं थे।दूसरे गांव वालों को जब पता चला तब वहां पहुंचे और फिर वृद्धा का अंतिम संस्कार किया गया।इस खबर ने पहाड़ के पलायन का पूरा सच उजागर कर दिया।कभी ये गांव खूब आबाद होता था ,बच्चे खेला करते थे,लेकिन आज सुनसान है।दो तीन जने वहां रहते हैं।इस गांव का मामला तो अखबारों में  आ गया इसलिए पता चला गया। वर्ना अधिकाशं गांव की स्थिति यही है। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुजाता पॉल ने इन मामले को लेकर गहरा दुख जताते हुए  अपनी पोस्ट में पलायन को लेकर सरकार पर जमकर गुस्सा उतारा है।ये सच है सरकार को न पहाड़ की और ना ही पलायन की चिंता है।
  सत्ता में बैठे लोग उत्तराखण्ड की सच्चाई को छिपाने के लिए ऐसा प्रचार करने में जुटे हैं कि जैसे कि पहाड़ में सब कुछ आल इज वेल है।अपनी और पहाड़ की छवि चमकाने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनकी सरकार पानी की तरह पैसा बहा रही है।जबकि सोशल मीडिया,मीडिया में तमाम भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं।लेकिन सरकार में डर खत्म हो चुका है।सरकार  यह जानने की कोशिश ही नहीं कर रही है कि पलायन कैसे रोका जाए,पहाड़ का विकास कैसे हो।क्योंकि देहरादून में बैठे अपनों का विकास ही पहाड़ का विकास माना जा रहा है।पलायन रोकने के नाम पर पौड़ी में पलायन निवारण आयोग का मुख्यालय खोला गया है।आयोग के मुखिया एस एस नेगी बनाए गए।जो खुद पौड़ी से पलायन कर चुके है।कहा जाता है पुस्तैनी घर बेच वह देहरादून चले गए हैं ।हालांकि आयोग ने अपनी तरफ से तमाम सुझाव दिए हैं,लेकिन सब कागजों तक सीमित हैं।
पौड़ी गढ़वाल मंडल की कमिश्नरी होती थी।कई सारे सरकारी विभाग होने के चलते रौनक रहती थी।राज्य बनने के बाद पौड़ी शहर की रौनक धीरे धीरे खत्म होने लगी।आधे से ज्यादा अफसर और कार्यालय देहरादून शिफ्ट हो गए। कोई देखने सुनने वाला है ही नहीं।ये तो कमिश्नरी मुख्यालय के हालात हैं।गांव की तो इससे भी खराब हालत है।मुख्यमंत्री धामी खुद पलायन आयोग के मुखिया हैं। सरकार के पास गांव खाली होने के तो आंकड़े होंगे।लेकिन गांव आवाद करने का कोई आंकड़ा नहीं होगा।क्योंकि पहाड़ की चिंता है ही नहीं।पहाड़ से पलायन रोकने के लिए सबसे पहले मूलभूत सुविधाएं चाहिए।मतलब  पक्की सड़कें हो, ,स्वास्थ्य की अच्छी सुविधा हो,अच्छे शैक्षणिक संस्थान हों, रोजगार के लिए संसाधन बढ़ाएं जाएं।ये सब कुछ हो नहीं रहा है।पॉल भी यही मुद्दा उठा रही हैं कि आखिर विकास कब होगा।दिखाने वाला विकास तराई के गिने चुने शहरों में सिमट कर रह गया है।
देहरादून,ऋषिकेश,हरिद्वार,पंतनगर,हल्द्वानी में खोले गए सरकारी ऑफिस ,मुख्यालयों को पहाड़ों में खोला जाता तो शायद पलायन रोका जा सकता था।
लेकिन धामी सरकार ने दूसरी सरकारों की तरह पहाड़ के दोहन में कोई कमी नहीं रखी।बीजेपी वाले ही अपनी सरकार पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगा चुके हैं।मसूरी,नीलकंठ और पहाड़ों में जितने भी रमणिक स्थल हैं ओने पौने दामों में बेचे जाने की खबरें।जिनकी जमीन होती थी अब वह नौकर बन काम कर रहे हैं।अभी हाल में मसूरी और आई टी पार्क के मामलो ने पहाड़ में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल पट्टी खोल कर रख दी।मसूरी वाले मामले में सरकार ने मोन साध लिया क्योंकि दिल्ली के बड़े अखबार ने घोटाला उजागर किया था।लेकिन आई टी पार्क का मामला लोकल स्वतंत्र पत्रकार अजीत राठी ने उठाया था तो सरकार ने पत्रकार को कानूनी नोटिस भिजवा दिया।पत्रकार के परिवार को पुलिस से डराया धमकाया गया।आईटी पार्क की जमीन में बिल्डर फ्लैट बना बेचेगा।वो भी उस कंपनी को 90 साल की लीज दी गई जो पुल घोटाले में फंस चुकी है।पत्रकार को दिए कानूनी नोटिस की दिल्ली के तमाम पत्रकार संगठनों ने निंदा कर सरकार को चेताया है।प्रेस क्लब ऑफ इंडिया,प्रेस एसोशिएशन, के बाद नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने भी पुलिस करवाई की कड़े शब्दों में निंदा कर सरकार के कदम को अलोकतांत्रिक बताया है।ये भ्रष्टाचार के वो मामले हैं जो सामने आ गए।बाकी का पता इसलिए नहीं चलता क्योंकि हमाम में सभी नंगे वाली कहावत चरितार्थ करते हैं। सरकार के व्यवहार से ऐसा लगता है कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण केवल ओर केवल दोहन के लिए हुआ है।90 साल की वृद्धा को मरने के बाद कंधे देने वाला नहीं मिला इस तरह खबरें आएंगी और एक दो दिन चर्चा के बाद सब भुला दिया जाएगा।समाप्त
The Sunday Mail
Author: The Sunday Mail

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