सांप्रदायिक राजनीति ने छीनी थी गहलोत से जीत
कन्हैयालाल हत्याकांड बना था आधार
द संडे मेल
जयपुर।राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाल में उदयपुर के कन्हैयालाल हत्याकांड का दो तीन बार जिक्र कर दोषियों को जल्द से जल्द सजा दिलवाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर रखा।गहलोत उम्मीद कर रहे थे कि प्रधानमंत्री राजस्थान के दौरे पर आ रहे हैं तो कन्हैयालाल के परिवार को जल्द से जल्द न्याय दिलवाने को लेकर कोई बात करेंगे।लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
कन्हैयालाल साहू की 2022 में निर्मम हत्या कर दी गई थी।पुलिस ने हत्यारों को तुरंत पकड़ लिया था,लेकिन संवेदन शील मामला देख केंद्र सरकार ने जांच खुद अपने हाथ में ले ली थी। केंद्रीय गृहमंत्रालय के तहत आने वाली जांच एजेंसी एनआईए मामले की तीन साल से जांच कर रही है,लेकिन दोषियों को अभी तक सजा नहीं मिल पाई।अब सवाल यह है कि पूर्व सीएम गहलोत कन्हैयालाल हत्याकांड को बार बार क्यों उठाते हैं? पहली बात पूर्व सीएम होने के नाते उनका कर्तव्य बनता है।दूसरी बात घटना उनके कार्यकाल में घटी थी।हालांकि उस समय प्रदेश का मुखिया होने के नाते गहलोत सरकार से जो हो सकता था उन्होंने किया।हमलावर तुरंत पकड़ लिए गए।कन्हैया लाल के परिवार को 51 लाख की मदद दे दी गई।बच्चों को नौकरी दिलवाई। गहलोत केवल दोषियों को सजा नहीं दिलवा पाए।क्योंकि जांच केंद्र की मोदी सरकार ने अपने हाथ में ले ली थी।
तीसरी और अहम बात यह है कि पूर्व सीएम गहलोत और उनकी सरकार को इस हत्याकांड का बड़ा खामियाजा उठाना पड़ा।इसके चलते वह जीती हुई बाजी हार गए।अगर यह हत्याकांड नहीं होता तो पार्टी में उनके विरोधी भी तय जीत को हार में नहीं बदल पाते।इस हत्याकांड से विरोधियों को भी दिल्ली में आलाकमान के कान भरने का मौका मिल गया।

विधानसभा 2023 के चुनाव के समय के प्रदर्शन
गहलोत सरकार के फैसलोंऔर जनकल्याणकारी योजनाओं के सामने मुद्दा विहीन बीजेपी को भी कन्हैयालाल हत्याकांड ऐसा मुद्दा मिला जिसने प्रदेश की राजनीति को ही बदल कर रख दिया।पूरे चुनाव को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया।जयपुर में हुई एक मुस्लिम की हत्या को कन्हैयालाल हत्याकांड से तुलना कर मदद के मामले में इतना झूठ वायरल किया गया कि पूरे चुनाव ने सांप्रदायिक रूप ले लिया।वोटर को लगा कि जब बीजेपी के बड़े बड़े नेता बोल रहे हैं कि हिन्दू को 5 लाख दिए और मुसलमान को 50 लाख तो वह सच मान बैठा। प्रदेश की जनता भावुकता में 25 लाख तक का फ्री इलाज भूल गई,सरकारी कर्मचारी ने पुरानी पेंशन योजना को ताक में रख दिया,किसान 5 हजार यूनिट फ्री बिजली की योजना को भूल गया।आम वोटर ने भी 300 यूनिट मुफ्त बिजली की चिंता नहीं की।मुफ्त अनाज के पैकेट, बढ़ी हुई पेंशन , स्वास्थ्य का अधिकार कानून सब एक झटके में भुला दिए गए।वोटिंग के दिन तक चुनाव पूरी तरह हिंदू मुस्लिम हो गया,कुछ विरोधियों ने हराने में ताकत लगाई और गहलोत जीता हुआ चुनाव हार गए।गहलोत की तीसरी पारी बढ़ी चुनौती वाली रही।पहले दो साल गहलोत सरकार कोरोना जैसी महामारी और पार्टी के भीतर विरोधियों से जूझते रहे।कोरोना जैसी महामारी से जनता को बचाने में काफी हद तक सफल रहे।देश दुनिया में उनकी सरकार की तारीफ भी हुई।लेकिन अपनों ने पूरा टेंशन देना जारी रखा।

बीच में कन्हैयालाल दोनों तरफ हत्या के आरोपी







