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25 साल का होने जा रहा उत्तराखंड आंदोलन की चपेट में

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आलाकमान नहीं चेता तो भुगतना होगा
पीएम मोदी फेस पर भी वोट मिलने के आसार होते जा रहे हैं कम
द संडे मेल
नई दिल्ली।उत्तराखंड 9 नवंबर को 25 साल का हो जाएगा।धामी सरकार की तरफ से बड़े आयोजन की तैयारी की जा रही है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समारोह में शामिल होंगे। प्रधानमंत्री मोदी पहली बार सालगिरह के कार्यक्रम में खुद शामिल होंगे।क्योंकि चुनाव साल लगने ही वाला है।लेकिन  उत्तराखंड की चमक दमक को लेकर जो टीवी में दिखाया जा रहा है और दूसरे मीडिया में बताया जा रहा है वैसा पहाड़ वालों के लिए कुछ हुआ नहीं है।पहाड़ वासी आज भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है।पुष्कर सिंह धामी पहले ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिनके खिलाफ प्रदेशभर में आंदोलन चल रहे हैं और आमजन में गुस्सा है।आंदोलन मूलभूत सुविधाओं को लेकर ज्यादा है।मतलब पूरे प्रदेश की बिगड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ हर जिला आंदोलन से ग्रस्त,गांव को जोड़ने वाली खस्ता सड़कों को लेकर नाराजगी है। ,कोटद्वार को हरिद्वार से जोड़ने वाला चिलर खाल मार्ग को लेकर आंदोलन बढ़ता ही जा रहा है।खनन माफिया,शराब माफिया के खिलाफ आमजन में रोष है।पुलिस इन्हें प्रोटेक्शन दे रही है।उत्तराखंड की बिगड़ी हालत की असल तस्वीर को दिल्ली तक नहीं पहुंचने दिया जा रहा है।हालत चिंताजनक है।देशी बनाम पहाड़ी की आवाजे सुनाई देने लगी है।राजधानी गैरसैंण बनाई जाए मांग ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है।

  भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को लेकर जितनी जल्दी जाग जाएगा उतना अच्छा होगा। वर्ना हिंदी बेल्ट का उत्तराखंड पहला राज्य होगा जहां पर बीजेपी सत्ता में वापसी नहीं कर पाएगी।पहाड़ के अधिकांश इलाकों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनकी सरकार के खिलाफ आमजन सड़कों पर है।सबसे अहम बात यह है कि राज्य बनने के 25 साल बाद भी पहाड़ी मूलभूत सुविधाओं को लेकर सड़कों पर है।इसमें गौर करने वाली बात यह है कि आंदोलन का नेतृत्व कोई राजनीतिक दल नहीं बल्कि  जनता खुद ही  कर रही है।धामी सरकार इन आंदोलनों को लेकर इसलिए भी निश्चिन्त है कि वह जानते हैं कि उन्हें तो पीएम ने सीएम बनाया है।इसलिए कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।दूसरा धामी को पता है कि चुनाव तो पीएम मोदी के फेस पर लड़ा जाएगा,इसलिए वह आंदोलनों और जनता की नाराजगी को महत्व नहीं दे रहे हैं।

  ये सच भी है कि बीजेपी हर राज्य का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेस पर लड़ती है और उनकी लोकप्रियता के दम पर चुनाव जीतती है।लेकिन राज्य में अगर किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया तो उत्तराखंड 2027 में बीजेपी के हाथ से निकल जाएगा।हालांकि कांग्रेस की अंदरूनी हालत काफी खराब है। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व राज्यों को महत्व नहीं देता है इसलिए सभी कांग्रेसी आपस में अलग अलग राजनीति करते दिखते है।इन हालात में रीजनल पार्टियां या कोई थर्ड फ्रंट उल्ट फेर कर सकता है।


उत्तराखंड की जनता गुस्से में बदलवा के लिए किसी को भी वोट दे सकती है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री धामी राज्य के कई इलाकों में चल रहे आंदोलनों को हल्के में ले रहे हैं।पिछले दिनों देहरादून में हुए बेरोजगारों के आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर सरकार के खिलाफ नाराजगी का बड़ा संदेश दिया था।लेकिन आंदोलन के उठने के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं।कुछ जानकार मानते हैं जमीन घोटालों और खनन घोटालों से ध्यान हटाने के लिए बेरोजगारों के आंदोलन को तूल पकड़ने दिया।लेकिन जब मामला दिल्ली तक पहुंचा तब वहां के दखल ने आंदोलन समाप्त करवाया।लेकिन इस आंदोलन के बाद प्रदेश में आंदोलनों में कोई कमी नहीं आई है।चौखुटिया का स्वास्थ्य व्यवस्था के खिलाफ शुरू किए गए आंदोलन ने बड़ा रूप धारण शुरू कर दिया।जब आंदोलनकारियों का देहरादून में प्रवेश होगा आंदोलन बड़ा रूप धारण कर सकता है।इस समय उत्तरकाशी,टिहरी,ऋषिकेश,अल्मोड़ा,नैनीताल मतलब हर जिले में कोई ना कोई आंदोलन चल रहा है।ऋषिकेश में एक युवक की हत्या के बाद जनता शराब माफियाओं के खिलाफ सड़कों पर है।
पहाड़ में महिलाएं नशे के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है।टिहरी जिले में प्रसव के बाद एक युवती की मौत का मामला बड़ा रूप धारण कर रहा है।कोटद्वार,श्रीनगर कई जगह आंदोलन चल रहे हैं।हल्द्वानी समेत कई इलाकों में जनप्रतिनिधियों का जनता विरोध कर गुस्सा जता रही है।मंत्री इंतजार में है कि आलाकमान कब फैसला करता है।उसी हिसाब से ब्यूरोक्रेसी चल रही है।चारों तरफ बीजेपी के लिए हालात ठीक नहीं है।समाप्त
The Sunday Mail
Author: The Sunday Mail

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